नाबालिग बालिका की अभिरक्षा मां–नानी को सौंपने के आदेश, गंगाशहर थानाधिकारी को निर्देश के बावजूद 11 दिन से बच्ची बरामद नहीं
नाबालिग बालिका की अभिरक्षा मां–नानी को सौंपने के आदेश, पुलिस अब तक नाकाम
बीकानेर में नाबालिग बालिका की अभिरक्षा को लेकर परिवार न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। परिवार न्यायालय संख्या 3 के पीठासीन अधिकारी अशोक चौधरी ने बालिका के सर्वोपरि हित को ध्यान में रखते हुए उसकी शारीरिक अभिरक्षा उसकी मां लीला एवं नानी पुष्पा देवी को सौंपने के आदेश दिए हैं।
प्रकरण के अनुसार, प्रार्थीनी लीला ने न्यायालय में प्रस्तुत याचिका में बताया कि 29 नवंबर 2024 को अप्रार्थी सुरजाराम कथित रूप से जबरन उसके घर में घुसा और नाबालिग बालिका को अपने साथ ले गया। इस घटना के बाद से बालिका मां-नानी से अलग है, जिससे उसके मानसिक और शारीरिक कल्याण पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए।
मामले की सुनवाई के दौरान सुरजाराम न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ, जिस पर न्यायालय ने उसके विरुद्ध एकपक्षीय कार्यवाही करते हुए आदेश पारित किया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि नाबालिग बालिका का कल्याण सर्वोच्च प्राथमिकता है और वर्तमान परिस्थितियों में उसकी अभिरक्षा मां और नानी को सौंपना ही न्यायोचित है।
आदेश में न्यायालय ने गंगाशहर थानाधिकारी को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिए कि सुरजाराम से बालिका को बरामद कर 15 दिवस के भीतर उसे मां-नानी की अभिरक्षा में सौंपा जाए। आदेश की गंभीरता को देखते हुए यह कार्रवाई त्वरित और प्रभावी होनी अपेक्षित थी।
हालांकि, आदेश जारी हुए 11 दिन बीत जाने के बावजूद बीकानेर पुलिस अब तक बालिका को बरामद नहीं कर पाई है। गंगाशहर पुलिस द्वारा सुरजाराम के जोधपुर स्थित संभावित ठिकानों पर दबिश दी गई, लेकिन पुलिस को चकमा देकर सुरजाराम नाबालिग बालिका को लेकर फरार हो गया।
इससे आहत मां लीला एवं नानी पुष्पा देवी ने शुक्रवार को पुलिस अधीक्षक कावेंद्र सिंह सागर से मुलाकात कर बालिका की शीघ्र बरामदगी की गुहार लगाई है। परिजनों का कहना है कि न्यायालय का स्पष्ट आदेश होने के बावजूद कार्रवाई में देरी से उनकी चिंता लगातार बढ़ रही है।
इस पूरे मामले में मां-नानी की ओर से अधिवक्ता अनिल सोनी ने पैरवी की। उनका कहना है कि यह केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि नाबालिग बालिका के मौलिक अधिकार और सुरक्षा से जुड़ा विषय है, जिसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं हो सकती।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बीकानेर पुलिस न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए नाबालिग बालिका की अभिरक्षा कब तक मां-नानी को सौंप पाती है। यह मामला न केवल प्रशासनिक जवाबदेही बल्कि बाल अधिकारों की गंभीर परीक्षा भी बन गया है।


