बीकानेर में त्रि-पुस्तक लोकार्पण एवं समीक्षा समारोह सम्पन्न, डॉ. मुकेश हर्ष की शोध कृतियों पर विद्वानों ने रखे विचार

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बीकानेर में त्रि-पुस्तक लोकार्पण एवं समीक्षा समारोह सम्पन्न, डॉ. मुकेश हर्ष की शोध कृतियों पर विद्वानों ने रखे विचार
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बीकानेर। साकेत शिक्षण संस्था एवं टीम धरणीधर के संयुक्त तत्वावधान में त्रि-पुस्तक समीक्षा एवं लोकार्पण समारोह का आयोजन स्थानीय धरणीधर रंगमंच, जनता प्याऊ मार्ग पर गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में साहित्य, शिक्षा एवं शोध जगत से जुड़े अनेक विद्वानों, शोधार्थियों एवं गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही।

समारोह में लेखक डॉ. मुकेश हर्ष द्वारा रचित तीन पुस्तकों — भारतीय संस्कृति समाज और पुष्करणा, बीकानेर की छतरियाँ : स्थापत्य एवं कलात्मक अध्ययन तथा चूरु जिले का स्थापत्य एवं कलात्मक अध्ययन — का अतिथियों द्वारा विधिवत लोकार्पण किया गया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। स्वागत उद्बोधन देते हुए आयोजक आनन्द जोशी ने कहा कि शोध एवं साहित्य समाज को नई दिशा प्रदान करते हैं और ऐसे कार्यों को निरंतर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

पुस्तकों की हुई विस्तृत समीक्षा

बीकानेर की छतरियाँ : स्थापत्य एवं कलात्मक अध्ययन पुस्तक की समीक्षा डॉ. नितिन गोयल ने करते हुए कहा कि पुस्तक में राजपरिवार के साथ गैर-शासकीय छतरियों का भी विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें मुगल, राजपूत, बंगाली एवं ब्रिटिश स्थापत्य प्रभावों का प्रभावी वर्णन देखने को मिलता है।

दूसरी पुस्तक भारतीय संस्कृति समाज और पुष्करणा की समीक्षा डॉ. अमित कुमार व्यास ने की। उन्होंने कहा कि बीकानेर की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में स्थानीय समाजों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसका अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

वहीं चूरु जिले का स्थापत्य एवं कलात्मक अध्ययन पुस्तक की समीक्षा सुनीता विश्नोई ने करते हुए बताया कि पुस्तक में मंदिरनुमा छतरियों, हवेलियों एवं स्थापत्य कला का अत्यंत प्रभावशाली अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता — जेठानंद व्यास

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जेठानंद व्यास ने कहा कि इतिहास को निष्पक्ष दृष्टिकोण से पुनर्लेखन की आवश्यकता है। उन्होंने शोधार्थियों एवं शिक्षकों को नए दृष्टिकोण से कार्य करने के लिए प्रेरित करते हुए हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजेन्द्र पुरोहित ने विज्ञान और इतिहास के पारस्परिक संबंधों पर आधारित अध्ययन को महत्वपूर्ण बताया।

विशिष्ट अतिथि डॉ. सुमंत व्यास ने कहा कि वर्तमान समय में ऐसे शोध कार्य विकसित भारत की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसके अलावा डॉ. मेघना शर्मा, भंवर लाल भादानी, प्रो. चंद्रशेखर कच्छावा एवं समाजसेवी राजेश चूरा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

लेखक डॉ. मुकेश हर्ष ने कहा कि इन पुस्तकों के लेखन का उद्देश्य क्षेत्रीय इतिहास, कला एवं संस्कृति को शोध के माध्यम से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाना है।

कार्यक्रम का संचालन ज्योति प्रकाश रंगा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन श्याम सुन्दर किराडू द्वारा प्रस्तुत किया गया।

इस अवसर पर शिक्षाविद, शोधार्थी, साहित्यकार, विद्यार्थी एवं बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।