साहित्यकार किरण राजपुरोहित ‘नितिला’ को पीएचडी की उपाधि, राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता पर किया शोध
प्रख्यात साहित्यकार किरण राजपुरोहित ‘नितिला’ को राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता विषय पर शोध के लिए माधव विश्वविद्यालय ने पीएचडी की उपाधि प्रदान की। साहित्य जगत ने इसे राजस्थानी भाषा और मातृभाषा शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
साहित्यकार किरण राजपुरोहित ‘नितिला’ को पीएचडी की उपाधि, राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता पर किया शोध
बीकानेर/श्रीडूंगरगढ़। प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार एवं राजस्थली के संपादक मंडल की सदस्या किरण राजपुरोहित ‘नितिला’ को माधव विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी (डॉक्टरेट) की उपाधि प्रदान की गई है। उन्होंने ‘राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता : एक राजनीतिक अध्ययन’ विषय पर अपना शोध कार्य पूर्ण किया।
मरूभूमि शोध संस्थान के कार्यालय सचिव एवं साहित्यकार रवि पुरोहित ने बताया कि यह शोध डॉ. विशाल भट्टाचार्य, सहायक प्रोफेसर के निर्देशन में पूरा किया गया। शोध में राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता, मातृभाषा में शिक्षा तथा राज्य के सामाजिक एवं राजनीतिक विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया गया है।
डॉक्टरेट अलंकरण समारोह में किरण राजपुरोहित ने कहा कि लगभग 8 करोड़ राजस्थानियों की मातृभाषा राजस्थानी में शिक्षा और रोजगार का अवसर उनका मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलना चिंता का विषय है।
उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा के स्थान पर अन्य भाषाओं में शिक्षा मिलने से बच्चों के स्वाभाविक बौद्धिक विकास पर प्रभाव पड़ता है। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं में राजस्थानी भाषा, इतिहास और संस्कृति से जुड़े विषयों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलने के कारण राज्य के अभ्यर्थियों को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
प्रख्यात साहित्यकार श्याम महर्षि ने कहा कि ‘ज्यूं सैंणी तितली’, ‘कांठळ’, ‘नेव निवाळी’, ‘गुड़िया रा बाळ’, ‘आंख्यां आळा आंधा’ और ‘झर-झर निर्झर’ जैसी चर्चित साहित्यिक कृतियों की रचयिता डॉ. किरण राजपुरोहित की यह उपलब्धि मातृभाषा में शिक्षा, शोध और व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में प्रेरणादायक है।
डॉ. किरण राजपुरोहित को पीएचडी की उपाधि मिलने पर मरूभूमि शोध संस्थान के निदेशक डॉ. बी.एल. भादानी, डॉ. मदन सैनी, डॉ. गजादान चारण, डॉ. चेतन स्वामी, रामचन्द्र राठी, विजय महर्षि, महावीर माली, श्रीभगवान सैनी, भगवती पारीक, सरोज शर्मा सहित अनेक साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे राजस्थानी भाषा और साहित्य जगत के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया।


