श्रीडूंगरगढ़ ग्यान गोठ में राजस्थानी भाषा पर मंथन: लोक से लाइक तक पहुंच बढ़ाने पर जोर

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श्रीडूंगरगढ़ ग्यान गोठ में राजस्थानी भाषा पर मंथन: लोक से लाइक तक पहुंच बढ़ाने पर जोर
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राजस्थान के श्रीडूंगरगढ़ में विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर मरूभूमि शोध संस्थान के तत्वावधान में आयोजित ग्यान गोठ में राजस्थानी भाषा के वर्तमान और भविष्य पर गंभीर चर्चा हुई। “राजस्थानी लोक से लाइक तक” विषय पर केंद्रित इस आयोजन में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों ने भाग लेकर विचार साझा किए।

युवा कथाकार हरीश बी. शर्मा ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल मंचों पर राजस्थानी कंटेंट तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। उन्होंने माना कि यह लोकप्रियता सकारात्मक संकेत है, लेकिन भाषा को आधिकारिक मान्यता दिलाने के लक्ष्य में सोशल मीडिया अभी अपेक्षित योगदान नहीं दे पा रहा। उनके अनुसार राजस्थानी कंटेंट निर्माताओं के सामने अच्छी स्क्रिप्ट और शोधपूर्ण सामग्री की कमी एक बड़ी चुनौती है।

कार्यक्रम के दौरान कई साहित्यकारों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। डॉ. तेजसिंह जोधा को महाराणा प्रताप राजस्थानी साहित्य सृजन पुरस्कार, डॉ. कृष्णा कुमारी को पं. मुखराम सिखवाल स्मृति पुरस्कार, श्रीमती प्रेम को सूर्य प्रकाश बिस्सा स्मृति सम्मान तथा पूर्ण शर्मा ‘पूर्ण’ को डूंगर कल्याणी स्मृति राजस्थानी बाल साहित्य सम्मान प्रदान किया गया। सम्मानित रचनाकारों ने अपने विचार रखते हुए भाषा संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया और रचनात्मक लेखन को बढ़ावा देने की अपील की।

मुख्य अतिथि राजस्थानी आलोचक डॉ. चेतन स्वामी ने अपने संबोधन में कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से राजस्थानी कंटेंट लगभग पंद्रह करोड़ लोगों तक पहुंच रहा है। उन्होंने बताया कि करीब बारह करोड़ लोग राजस्थानी बोलते हैं, लेकिन इसकी सामग्री हरियाणा, पंजाब और मालवा जैसे क्षेत्रों में भी देखी और समझी जा रही है। इससे स्पष्ट है कि भाषा की पहुंच सीमाओं से आगे बढ़ रही है।

उन्होंने विद्यार्थियों तक मातृभाषा को पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि नए पाठक तैयार करना बेहद जरूरी है। यदि नई पीढ़ी पढ़ने और लिखने से जुड़ती है तो भाषा का भविष्य सुरक्षित रहेगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्याम महर्षि ने की। उन्होंने कहा कि राजस्थानी लोक साहित्य और लोक संगीत की लोकप्रियता वैश्विक स्तर तक फैली है और इसे व्यवस्थित अभियान के जरिए पाठकों तक पहुंचाना चाहिए।

इस अवसर पर कई विद्वान और समाजजन उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. के.सी. सोनी, डॉ. मदन सैनी, डॉ. महावीर पंवार, डॉ. कृष्ण लाल विश्नोई, भरतसिंह राठौड़, हरिराम सारण, विजयराज सेठिया सहित अन्य गणमान्य शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार रवि पुरोहित ने किया और आभार युवा कवयित्री भगवती पारीक ‘मनु’ ने व्यक्त किया।

यह आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि यदि समाज और साहित्य जगत मिलकर प्रयास करें तो राजस्थानी भाषा की पहचान और प्रभाव दोनों को नई ऊंचाई मिल सकती है।