श्रीडूंगरगढ़ में नेत्रदान की मिसाल: कमलादेवी डागा ने मृत्यु के बाद भी रोशन किए जीवन

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श्रीडूंगरगढ़ में नेत्रदान की मिसाल: कमलादेवी डागा ने मृत्यु के बाद भी रोशन किए जीवन
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राजस्थान के श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में मानवता और सेवा की अद्भुत मिसाल सामने आई है, जहां कमलादेवी डागा ने मृत्यु के बाद नेत्रदान कर समाज को प्रेरणा देने वाला कार्य किया। 20 फरवरी 2026 को उनके स्वर्गवास के पश्चात परिवारजनों की सहमति से यह नेत्रदान संपन्न हुआ, जिससे किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के जीवन में नई रोशनी आने की उम्मीद है।

कमलादेवी डागा का यह निर्णय केवल एक दान नहीं बल्कि जीवन मूल्यों का संदेश है। यह कदम करुणा, सेवा और परोपकार की उस भावना को दर्शाता है जो भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से जैन परंपरा में महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनके परिवार ने बताया कि यह इच्छा स्वयं दिवंगत की थी और परिजनों ने इसे पूरा कर उनके संकल्प को साकार किया।

नेत्रदान के लिए सहमति देने वालों में उनके देवर कैलाशचंद डागा और पुत्रियां सरिता संचेती, हेमलता बुच्चा, सुनीता भंसाली, कान्ता बुच्चा, संगीता सहित अन्य परिवारजन प्रमुख रहे। इस अवसर पर समाज के कई गणमान्य लोग भी उपस्थित थे, जिन्होंने इस पुण्य कार्य की सराहना की और इसे समाज के लिए प्रेरणादायक बताया।

नेत्र संग्रह की प्रक्रिया प्राणनाथ हॉस्पिटल की मेडिकल टीम द्वारा पूरी की गई। विशेषज्ञों के अनुसार नेत्रदान का एक निर्णय दो व्यक्तियों को दृष्टि दे सकता है, इसलिए इसे महादान कहा जाता है। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने भी इस बात पर जोर दिया कि यदि समाज में अधिक लोग नेत्रदान का संकल्प लें तो हजारों दृष्टिहीनों का जीवन उज्जवल हो सकता है।

इस दौरान तेरापंथ युवक परिषद के पदाधिकारियों ने लोगों से मरणोपरांत नेत्रदान के लिए आगे आने की अपील की। परिषद के प्रतिनिधियों ने बताया कि संगठन लंबे समय से नेत्रदान जागरूकता अभियान चला रहा है और अब तक कई जरूरतमंदों तक प्रकाश पहुंचाने में सफल रहा है।

कार्यक्रम में मोमासर सरपंच सरिता संचेती, उपसरपंच जुगराज संचेती, पवन सेठिया, प्रभात अग्रवाल, अंकित भंसाली, राजकुमार नाई सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि ऐसे प्रेरणादायक उदाहरण समाज को सकारात्मक दिशा देते हैं और दूसरों को भी सेवा कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं।

समाजसेवियों का मानना है कि नेत्रदान केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि मानवता का सर्वोच्च रूप है। कमलादेवी डागा का यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गया है और यह संदेश देता है कि जीवन समाप्त होने के बाद भी सेवा का दीप जलाया जा सकता है।