हिंदी पत्रकारिता दिवस 2026: एआई के दौर में मौलिक लेखन बचाना सबसे बड़ी चुनौती, बीकानेर परिसंवाद में पत्रकारिता के भविष्य पर मंथन

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हिंदी पत्रकारिता दिवस 2026: एआई के दौर में मौलिक लेखन बचाना सबसे बड़ी चुनौती, बीकानेर परिसंवाद में पत्रकारिता के भविष्य पर मंथन
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हिंदी पत्रकारिता दिवस 2026: एआई के दौर में मौलिक लेखन बचाना सबसे बड़ी चुनौती, बीकानेर परिसंवाद में पत्रकारिता के भविष्य पर मंथन

बीकानेर। हिंदी पत्रकारिता दिवस की पूर्व संध्या पर जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ राजस्थान (जार) की बीकानेर जिला इकाई द्वारा आयोजित परिसंवाद में मीडिया के बदलते स्वरूप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से उत्पन्न चुनौतियों तथा हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पर गंभीर चर्चा की गई। होटल वृंदावन रेजिडेंसी में आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकारों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और सामाजिक चिंतकों ने पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. मनोज दीक्षित ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास संघर्ष, साहस और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा कि तकनीक और एआई ने पत्रकारिता को नई दिशा दी है, लेकिन इसके साथ ही मौलिक लेखन और स्वतंत्र चिंतन पर खतरा भी बढ़ा है। उन्होंने पत्रकारिता की आत्मा को उसकी मौलिकता बताते हुए इसे संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार राजीव हर्ष ने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर करना और समाधान की दिशा में सकारात्मक पहल करना भी है। उन्होंने अतिक्रमण, पर्यावरण संरक्षण, जलाशयों की दुर्दशा और जनसमस्याओं जैसे विषयों पर गंभीर एवं जनहितकारी पत्रकारिता की आवश्यकता बताई।

परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए जार प्रदेशाध्यक्ष श्याम मारू ने कहा कि पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। पत्रकार समाज और शासन के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करता है। उन्होंने निष्पक्षता, ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों को पत्रकारिता की मूल शक्ति बताया।

भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य डॉ. सत्यप्रकाश आचार्य ने कहा कि पहले पत्रकारिता में विचार और विश्लेषण प्रमुख हुआ करते थे, जबकि वर्तमान समय में सूचनात्मक पत्रकारिता का प्रभाव बढ़ा है। उन्होंने पत्रकारों से समाज के कमजोर वर्गों और जनसमस्याओं को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।

जनसंपर्क विभाग के उपनिदेशक डॉ. हरिशंकर आचार्य ने कहा कि डिजिटल युग में युवाओं की लेखन और अध्ययन क्षमता प्रभावित हो रही है। उन्होंने नई पीढ़ी को पढ़ने और स्वयं लिखने की आदत विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

राजस्थानी साहित्यकार कमल रंगा ने खोजी पत्रकारिता को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि पत्रकारों को तथ्यों की गहराई तक जाकर सच्चाई सामने लानी चाहिए। वहीं वरिष्ठ पत्रकार हरीश बी. शर्मा ने पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता पर जोर देते हुए पत्रकारों की सुरक्षा और प्रशिक्षण को समय की मांग बताया।

नेहरू शारदा विद्यापीठ कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत बिस्सा ने पत्रकारिता को संघर्ष और समर्पण का क्षेत्र बताते हुए कहा कि निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार ही समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। उन्होंने पत्रकार संगठनों से प्रशिक्षण और संवाद की परंपरा को मजबूत करने का आह्वान किया।

कार्यक्रम का संचालन जार बीकानेर जिला अध्यक्ष प्रमोद आचार्य ने किया। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए अतिथियों का स्वागत और अंत में आभार व्यक्त किया।

परिसंवाद में कुशाल सिंह मेड़तिया, संजय आचार्य वरुण, राजा ओझा, सुमेस्ता बिश्नोई, गौरीशंकर प्रजापत, विशाल सोलंकी, रमजान मुगल, विक्रम जागरवाल, मोहन थानवी, राजेश छंगाणी, मुकेश पुरोहित, महावीर सिंह राजपुरोहित, आर.सी. सिरोही, महेंद्र जोशी, वीरेंद्र किराडू, अविनाश आचार्य और रेणुबाला सोलंकी सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि निष्पक्ष, निर्भीक और जनहित आधारित हिंदी पत्रकारिता ही समाज के वंचित और पीड़ित वर्गों की आवाज बन सकती है। साथ ही एआई के बढ़ते प्रभाव के बीच पत्रकारिता की विश्वसनीयता, मौलिक लेखन और नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।