धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ में बीकानेर के श्री विश्नोई की महत्वपूर्ण भूमिका, मिठडिया गांव से बॉलीवुड तक का सफर
धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ में बीकानेर के श्री विश्नोई की अहम भूमिका
यह जरूरी नहीं कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों तक सीमित हो। राजस्थान का बीकानेर समय-समय पर ऐसी प्रतिभाओं को जन्म देता रहा है जिन्होंने मनोरंजन जगत में अपनी पहचान बनाई है। इसी कड़ी में अब एक नया नाम जुड़ गया है — श्री विश्नोई, जिन्होंने फिल्म ‘इक्कीस’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर बीकानेर का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है।
श्री विश्नोई इक्कीस फिल्म के जरिए सुर्खियों में आए हैं। यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें उन्होंने ‘पराग सिंह’ नामक किरदार निभाया है। उनके अभिनय को सराहना मिल रही है और यह भूमिका उनके करियर के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है। खास बात यह भी बताई जा रही है कि यह फिल्म बीकानेर से जुड़े दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की अंतिम फिल्मों में से एक मानी जा रही है, जिससे फिल्म की चर्चा और बढ़ गई है।
श्री विश्नोई का संबंध बीकानेर जिले की बज्जू तहसील के मिठडिया गांव से है। एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर बॉलीवुड तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं था। उन्होंने अपने अभिनय सफर की शुरुआत थिएटर से की और अब तक लगभग 20 नाटकों के साथ कई वेब सीरीज में काम कर चुके हैं। अभिनय के प्रति उनकी लगन और निरंतर मेहनत ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में पहचान दिलाई।
गांव से मुंबई तक का सफर संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने सपने को जिंदा रखा। उनके करीबी बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था और वे स्कूल-कॉलेज के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे।
जैसे ही मिठडिया गांव और आसपास के क्षेत्रों में यह खबर पहुंची कि श्री विश्नोई का चयन फिल्म ‘इक्कीस’ में हुआ है, क्षेत्र में खुशी का माहौल बन गया। स्थानीय लोगों ने इसे पूरे बीकानेर के लिए गर्व का क्षण बताया। गांव के युवाओं के लिए यह प्रेरणा है कि मेहनत और धैर्य से बड़े मंच तक पहुंचा जा सकता है।
श्री विश्नोई का जन्म वर्ष 1995 में हुआ। वे इससे पहले ‘कांची’ (2023) और ‘सिंगलहुड’ (2021) जैसे प्रोजेक्ट्स से भी जुड़े रहे हैं। लेकिन इक्कीस में मिली भूमिका ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई है।
श्री विश्नोई इक्कीस फिल्म के जरिए यह संदेश साफ है कि छोटे शहरों और गांवों की प्रतिभाएं भी बड़े परदे पर चमक सकती हैं। बीकानेर का यह बेटा आज उन युवाओं के लिए मिसाल बन गया है जो सपने तो बड़े देखते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी से घबराते हैं।


