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मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो रहे कोरोना वायरस की उत्पत्ति रहस्यों के गर्त में छिपी

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अपने उत्पादों से दुनिया की बाजारों को पाट देने वाला चीन अब इसी (अव) गुण के चलते शक के घेरे में है। हाल ही में अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में ये बात सामने आई कि नवंबर 2019 में चीन के वुहान इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी के तीन शोधकर्ता गंभीर रूप से बीमार हो गए थे, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यह स्पष्ट नहीं है कि वे कोरोना से पीड़ित हुए थे, लैब भी इस रिपोर्ट को खारिज कर रही है, लेकिन पूर्व में वायरस के पैदा होने के संबंध में सामने आई लैब-लीक थ्योरी को इससे बल मिला है। लिहाजा एक बार फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम चीन में जाकर वायरस की उत्पत्ति की खोजबीन करने की तैयारी में है।

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज के डायरेक्टर डॉ एंथोनी फासी भी वायरस के प्राकृतिक रूप से पैदा होने की बात से सहमत नहीं है। इसमें और जांच की जरूरत की वे वकालत कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सलाहकार जैमी मेजल भी लैब-लीक थ्योरी को संभव मानते हैं। उनका कहना है कि वायरस और उसकी वैक्सीन को लेकर दुनिया में तमाम प्रयोग होते रहते हैं। हो सकता है कि इसी क्रम में चीन की वुहान लैब में दुर्घटना बस इस वायरस का प्रसार हो गया हो। दुनिया के कई प्रतिष्ठित वायरोलॉजिस्ट मानते हैं कि उन्होंने प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ ऐसा कोई वायरस नहीं देखा जो अफ्रीका के 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी उतना ही प्रभावी हो जितना एवरेस्ट के माइनस 40 डिग्री तापमान में। ऊपर से वायरस की उत्पत्ति पर चीन की लीपापोती शक को और गहरा करती है। आज जिस वायरस ने दुनिया में कोहराम मचा रखा हो, मानवता सहम और सिहर चुकी हो, आखिर उसकी उत्पत्ति की जबावदेही तो तय करनी ही होगी। ऐसे में कोरोना वायरस के लैब निर्मित और प्राकृतिक रूप से पैदा होने के पीछे की तमाम अवधारणाओं की पड़ताल आज बड़ा मुद्दा है।

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लैब से वायरस फैलने का एक बड़ा साक्ष्य यह है कि महामारी फैलने से पहले वुहान की लैब में शोध करने वाले तीन विज्ञानी गंभीर रूप से बीमार हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था। उस वक्त चीन ने यह नहीं बताया कि उन विज्ञानियों को क्या हुआ था। तब वे चमगादड़ में मौजूद सार्स वायरस पर शोध कर रहे थे। इस तरह का शोध बीएसएल (बायो सेफ्टी लेवल)-4 लैब में होता है। जहां सुरक्षा के तमाम उपाय किए जाते हैं। वह लैब आयरन ट्यूब की तरह होती है। उससे कुछ भी बाहर नहीं जा सकता है। उस लैब में जाने से पहले और लैब से बाहर निकलने के वक्त एहतियात बरतनी पड़ती है। इसलिए लैब से एक भी वायरस बाहर नहीं निकल सकता लेकिन चीन में तीन वैज्ञानिकों के संक्रमित होने की घटना बड़ी थी। अस्पताल में आसानी से वायरस की जांच हो सकती थी। क्योंकि यह वायरस नाक, लार, मल व यूरिन में मौजूद होता है। इसलिए वायरस की आसानी से पहचान की जा सकती है लेकिन चीन ने किसी को बताया नहीं था।

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दूसरा परिस्थितिजन्य साक्ष्य यह है कि सामान्यतौर पर वायरस संक्रमित लोगों से दूसरों में फैलता है। जबकि इस वायरस में बगैर लक्षण वाले लोगों से भी संक्रमण फैलता है, इस वजह से यह वायरस थोड़ा अलग है। आमतौर पर विभिन्न वायरस का संक्रमण किसी खास मौसम में अधिक होता है। जबकि इस कोरोना में ऐसा नहीं है। इस वजह से यह आकलन किया जा रहा है कि यह वायरस वुहान लैब से निकला हो सकता है। जब वैज्ञानिक लैब में शोध कर रहे थे तो वे संक्रमित होकर अस्पताल गए। अस्पताल से यह बीमारी दूसरे लोगों में फैल गई।

दरअसल, लैब से वायरस के लीक होने के सिद्धांत पर अभी तक जांच नहीं हुई है। क्योंकि चीन ने इस मामले पर सहयोग नहीं किया है। अब एक बार फिर डब्ल्यूएचओ की टीम जा रही है जो इन तमाम पहलुओं पर जांच करेगी। ऐसी बात सामने आई है कि वुहान की लैब में वैज्ञानिक चमगादड़ में पाए गए कोरोना वायरस में रिवर्स इंजीनियरिंग कर रहे थे ताकि वायरस के स्वरूप में बदलाव करके उसे इंसानों में संक्रमण लायक बना सकें। लेकिन अभी तक इस बात का साक्ष्य नहीं मिला है कि यह रिवर्स इंजीनियरिंग से संक्रमण फैला। नए सार्स कोव-2 वायरस के स्पाइक प्रोटीन-1 व स्पाइक-2 के बीच फ्यूरिन साइट है, जिसके कारण वायरस अधिक संक्रामक हो जाता है। यह सोचा जा रहा था कि क्या वायरस में रिवर्स इंजीनियरिंग से फ्यूरिन को डाला गया गया है क्योंकि पुराने सार्स वायरस में यह चीज नहीं थी।

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एक बात यह भी आई कि वायरस में आरएटीजी13 नामक एक साइट है, इसमें बदलाव कर वायरस की मारक क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इससे वायरस अधिक संक्रामक हो सकता है। यह बात सामने आई है कि वुहान की लैब में वैज्ञानिक आरएटीजी13 वायरस पर काम कर रहे थे। अमेरिका ने फंडिंग भी की थी। बाद में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस पर रोक लगा दी थी। लेकिन यह मालूम नहीं है कि अमेरिका से फंडिंग रोकने के बाद चीन की लैब में प्रयोग बंद हुआ या नहीं। लेकिन नैतिक रूप से इस तरह के शोध की अनुमति नहीं होती। क्योंकि इससे वायरस में बदलाव हो जाता है। पहले भी बर्ड फ्लू के वायरस में इस तरह का बदलाव किया गया था लेकिन दुनिया भर में विरोध के बाद उसे नष्ट करना पड़ा था।

पुराने सार्स में सिवेट कैट वायरस के एक बिचौलिए संवाहक के रूप में था। सार्स का वायरस चमगादड़ से सिवेट कैट में पहुंचा। इसके माध्यम से इंसानों में पहुंचा लेकिन नए कोरोना वायरस में चमगादड़ के बाद का संवाहक अब तक नहीं मिला है, जिससे वायरस इंसान में फैला। चमगादड़ के वायरस में 96 फीसद समानता है। लेकिन इंसान में संक्रमण के लिए यह आंकड़ा बहुत दूर है। इसलिए अभी दोनों थ्योरी से इंकार नहीं किया जा सकता। वायरस में लगातार म्यूटेशन हो रहा है और टीके से नियंत्रित भी हो रहा है। इसलिए एक बात स्पष्ट है कि यह जैविक हथियार नहीं है।

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