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महाशिवरात्रि विशेष: इसलिए की जाती है शिवलिंग की पूजा, कम लोग जानते हैं यह रहस्य

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महाशिवरात्रि विशेष: इसलिए की जाती है शिवलिंग की पूजा, कम लोग जानते हैं यह रहस्य

 

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अजित कुमार मिश्रा

भारतीय धर्म पद्धतियों में सनातन काल से लिंग पूजा का चलन रहा है। यह तक कि सिंधु सभ्यता में भी लिंग और योनि के अवशेष मिले हैं। क्या लिंग के वे अवशेष शिवलिंग की पूजा से संबंधित हैं? यह कह पाना तब तक संभव नहीं है जब तक सिंधु सभ्यता की लिपियों को पढ़ने में सफलता नहीं मिलती। वैसे पशुपति की मुहरें और सांडों की मूर्तियों एक अघोषित शैव परंपरा की तरफ जरूर इशारा कर रही है। फिर भी निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। वैदिक ग्रंथों में हम कुदरत के रूप में देवताओं की पूजा देखते हैं। इंद्र, वरुण, सूर्य आदि देवता कुदरत की शक्तियों के प्रतिक रहे हैं लेकिन लिंग पूजा का वर्णन ऋग्वेद में नहीं मिलता।

 

लिंग क्या ईश्वर के शरीर का अंग विशेष है?
यह एक भ्रांति है। लिंग पुराण के अनुसार, लिंग अव्यक्त परमेश्वर का स्थूल रूप है। शैव मत में शिव निराकार रूप में अलिंगी कहे जाते हैं और लिंग स्थूल रूप में उनका व्यक्त रूप है। दरअसल, लिंग की संकल्पना सृष्टि के निर्माण से जुड़ी है। निराकार परमेश्वर जब सृष्टि का निर्माण करता है तो कुदरती रूप में लिंग के रूप में प्रकट होता है। लिंग का आधार योनि स्वरूप योगमाया या माया होती है। इसी स्थूल रूपी लिंग और योनि स्वरूप माया से संसार की सृष्टि होती है और प्रलय भी इसी लिंग शब्द की उत्पत्ति ”लयनात् इति लिंग:” से हुई है यानी जिस निराकार (अलिंगी) परमेश्वर के स्थूल रूप (लिंग) में संसार का लय हो जाता है।

 

क्या लिंग पूजा विशेष देवता से जुड़ी है?
यह भ्रामक धारण है। परमेश्वर को विभिन्न स्वरूपों और नामों से बुलाया जाता है। वे शिव हो सकते हैं, विष्णु हो सकते हैं, ब्रह्मा हो सकते हैं या कोई दूसरे ईश्वरीय नाम से पुकारे जा सकते हैं। दरअसल जहां भी सृष्टि के निर्माता के लिए जिस भी ईश्वरीय सत्ता को परमेश्वर कहा जाता है, उनके स्थूल रूप या मूर्त रूप को लिंग कहा जाता है। आदिगुरु शंकराचार्य ने विष्णु के स्थूल मूर्त रूप को ”परब्रह्मलिंग भजे पाण्डुरंगम्” कहा है। भगवान कृष्ण ने भी देवताओं की सभी मूर्तियों को लिंग कहा है। सृष्टि के निर्माता के रूप में भगवान सूर्य को एकलिंगी कहा जाता है।

शिवलिंग की पूजा ज्यादा प्रचलित
शैव मत के अनुसार, भगवान शिव ने खुद को वारह ज्योतिर्लिंगों के रूप में प्रकट किया था। माता पार्वती ने भी भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए बालू से लिंग बनाकर पूजा की थी। जब एकबार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु ने खुद को सृष्टि का रचियता बताने की शर्त लगी थी, तब भगवान शिव एक ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे, जिसके ओर-छोर का पता लगाने में ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही असफल रहे थे। ऐसे में उस लिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने खुद को सृष्टि का आदिपुरुष बताकर दोनों का भ्रम दूर किया था।

 

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