क्या बूस्टर डोज टालने की आप भी कर रहे हैं बड़ी गलती? जानिए एक्‍सपर्ट्स की राय

क्या बूस्टर डोज टालने की आप भी कर रहे हैं बड़ी गलती? जानिए एक्‍सपर्ट्स की राय
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बूस्‍टर डोज लगवाने में लोगों की दिलचस्‍पी ठंडी है। जो लोग कोरोना की दोनों वैक्‍सीन लगवा चुके हैं, उन्‍हें बूस्‍टर डोज लेनी है। चार महीने पहले सरकार ने इसकी इजाजत दी थी। यह और बात है कि इसे लेकर लोगों में उत्‍साह की कमी दिख रही है। आंकड़े इसकी बानगी देते हैं। राजधानी दिल्‍ली का ही उदाहरण लेते हैं। महानगर में 18 साल से ज्‍यादा के उम्र के 17 फीसदी से भी कम लोगों ने कोरोना की प्रिकॉशनरी या एहतियाती डोज ली है। ऐसा ही ट्रेंड दूसरे राज्‍यों खासतौर से ग्रामीण इलाकों में देखा जा रहा है। केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पूरे देश में 24 मई तक 3.3 करोड़ से भी कम लोगों ने प्रिकॉशनरी डोज ली है।

हीलाहवाली है या कुछ और?

मशहूर इम्‍यूनोलॉजिस्‍ट और एम्‍स के पूर्व डीन डॉ एनके मेहरा ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्‍स ऑफ इंडिया (TOI) के साथ बातचीत में कहा कि अब कोरोना के काफी कम केस आ रहे हैं। इसके अलावा संक्रमित लोगों को हॉस्पिटल में भर्ती होने की जरूरत भी कम पड़ रही है। लोगों को लगने लगा है कि महामारी का सबसे बुरा दौर खत्‍म हो चुका है।

मेहरा के अनुसार, यह सही हो सकता है कि महामारी का सबसे खराब दौरा समाप्‍त हो चुका है। लेकिन, अच्‍छा होगा कि जो लोग प्रिकॉशनरी डोज के लिए पात्र हैं, वो इसे लगवा लें। यह बीमारी से बेहतर सुरक्षा के लिए जरूरी है।

क्‍यों लेनी चाहिए प्रिकॉशनरी डोज?

पब्लिक हेल्‍थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसीडेंट डॉ के श्रीनाथ रेड्डी ने कहा कि दुनिया में कोविड के हालात उथल-पुथल वाले हैं। ओमीक्रॉन के वेरिएंट काफी ज्‍यादा इंफेक्‍शियस हैं। ये नैचुरल इंफेक्‍शन और वैक्‍सीन से मिलने वाली इम्‍युनिटी को धता बता सकते हैं। हालांकि, यह साफ हो गया है कि ये वेरिएंट ज्‍यादातर लोगों में गंभीर बीमारी पैदा नहीं कर रहे हैं। लेकिन, चौंकन्‍ना रहने की जरूरत है। खासतौर से यह देखते हुए कि कोरोना के अलग-अलग वेरिएंट उभर रहे हैं। ओमीक्रोन कहानी का अंत हो सकता है। लेकिन, दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

रेड्डी ने कहा कि इम्‍युनिटी हासिल करने का एक तरीका वैक्‍सीनेशन है। लिहाजा लोगों को प्रिकॉशनरी डोज लेनी चाहिए। इसी में समझदारी है। वैसे, तीसरी, चौथी या इससे अधिक डोज की जरूरत पर कोई डेटा उपलब्‍ध नहीं है।

तस्‍वीर बदलने में नहीं लगती देर

22 मई को विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) के चीफ ने आगाह किया था कि महामारी निश्चित तौर पर खत्‍म नहीं हुई है। उन्‍होंने संकेत दिया था कि लोगों में थोड़ी लापरवाही टेस्टिंग में कमी के कारण हो सकती है।

पिछले साल कोरोना के डेल्‍टा वेरिएंट ने कहर बरपाया था। इसके उलट इस साल के शुरू में सामने आया ओमीक्रोन वेरिएंट अपेक्षाकृत हल्‍का रहा। हालांकि, वायरस में कोई एक म्‍यूटेशन पूरी तस्‍वीर बदल सकता है। लंबे अंतराल के बाद पिछले हफ्ते अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर कोरोना के केस बढ़े हैं। चीन और उत्‍तर कोरिया में महामारी ने फन उठाया है। जापान और ऑस्‍ट्रेलिया जहां बड़े पैमाने पर वैक्‍सीनेशन हो चुका है, वहां भी कोरोना के केस बढ़े हैं। कोरोना के केसों में बढ़ोतरी नए वेरिएंट ऑफ कन्‍सर्न को जन्‍म दे सकती है। हालांकि, प्रिकॉशनरी डोज ले लेने से इस तरह के खतरे से बचा जा सकता है।

नौ महीने का गैप बहुत ज्‍यादा

दूसरी और प्रिकॉशनरी डोज के बीच सरकार ने नौ महीने के गैप को अनिवार्य रखा है। हालांकि एक्‍सपर्ट्स कहते हैं कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। फोर्टिस सी-डॉक के चेयरमैन डॉ अनूप मिश्रा ने कहा कि ज्‍यादातर अध्‍ययन दिखाते हैं कि दोनों वैक्‍सीन डोज से न्‍यूट्रलाइज करने वाली एंटीबॉडीज 4-6 महीने के बाद बननी शुरू हो जाती हैं। लिहाजा, गैप 6 महीने से ज्‍यादा नहीं होना चाहिए। दूसरे देशों में लोगों को इतना लंबा इंतजार करने के लिए नहीं कहा जाता है।

अमेरिका में सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) ने दूसरी और बूस्‍टर डोज के बीच कम से कम पांच महीने के गैप की अनुशंसा की है। ब्रिटेन में जिन लोगों का इम्‍यून सिस्‍टम बहुत ज्‍यादा कमजोर है, वो दूसरी डोज के 8 हफ्ते के बाद कभी भी बूस्‍टर डोज ले सकते हैं।

जो लोग वैक्‍सीन की दो डोज ले चुके हैं और हाल में कोरोना संक्रमित पाए गए हैं, उनके लिए क्‍या? एम्‍स में मेडिसिन के एडिशनल प्रोफेसर डॉ नीरज निश्चल ने कहा कि ऐसे मामलों में वैक्‍सीन लेने से पहले कम से कम तीन महीनों का इंतजार करना चाहिए।