राजस्थली का आगामी अंक होगा महिला लेखन विशेषांक,108 से अधिक रचनाकार होंगी शामिल ,हीरक जयंती वर्ष में होगा भव्य आयोजन

राजस्थली का आगामी अंक होगा महिला लेखन विशेषांक,108 से अधिक रचनाकार होंगी शामिल ,हीरक जयंती वर्ष में होगा भव्य आयोजन
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बीकानेर/श्रीडूंगरगढ़  ।लोक चेतना की राजस्थानी तिमाही पत्रिका राजस्थली के प्रकाशन को 45  वर्ष   पूर्ण होने के अवसर पर इस बार का अंक राजस्थानी महिला लेखन पर केन्द्रित होगा। इस आशय की जानकारी देते हुए पत्रिका के मुख्य संपादक श्याम महर्षि ने बताया कि सबसे पुरानी व निरंतर प्रकाशित होने वाली राजस्थानी पत्रिका इस खुशी के मौके पर पत्रिका का आगामी अंक महिला लेखन पर विशेषांक के रूप में केन्द्रित करेगी।

साथ ही  लेखिकाओं के लिए अलग से समारोह को भी राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति के हीरक जयंती आयोजन सूची में शामिल किया गया है। प्रबंध संपादक रवि पुरोहित ने बताया कि महिला लेखन अंक के अतिथि संपादक की जिम्मेदारी लब्ध प्रतिष्ठ कहानीकार-कवयित्री किरण राजपुरोहित नितिला, जोधपुर को सौंपी गई है। अंक का स्वरूप निर्धारण व शामिल की जाने वाली रचनाओं का चयन-संपादन वे ही करेंगी। अतिथि संपादक किरण राजपुरोहित ने कहा कि हीरक जयंती महोत्सव में आधी दुनियां को शामिल किया जाना गर्व का विषय है।  प्रयास रहेगा कि इस विशेषांक में  तमाम विधाओं की मौलिक रचनाओं के प्रकाशन के साथ राजस्थानी महिला लेखन की अब तक की यात्रा का आलोचनात्मक परीक्षण करते आलेख भी शामिल किए जायें।विशेषांक के समाचार से राजस्थानी लेखिकाओं की लेखन के प्रति हूंस बढेगी और उनके लिखे को एक व्यापक मंच मिलेगा।


लेखिकाओं को उचित मंच देने के दृष्टिगत राजस्थली व्हाट्स अप ग्रुप में  गुरुकुल की स्थापना की गई, जिसमें विभिन्न विधाओं के विद्वान लेखिकाओं को उस विधा के इतिहास व वर्तमान से साक्षात करवाने के साथ रचनात्मक बारीकियां बतायेंगे और उस विधा में सृजन सिखायेंगे। इसी प्रयास में गत दो माह में राजस्थानी दूहों पर केन्द्रित कार्यशाला में 29 लेखिकाओं को दूहाकार के रूप में दूहाचार्य भंवरलाल सुथार ने  दीक्षित किया और  दोहों का यह संकलन संस्था द्वारा शीघ्र पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित होगा। इसी तरह आशा पांडे ओझा के सान्निध्य व सम्पादन में राजस्थानी हाइकु पर भी कार्यशाला आयोजित हुई और 27 हाइकुकारों को प्रशंसित किया गया। नितिला ने बताया कि इस तरह के नवाचारों व सर्वथा अनौपचारिक उपक्रमों से राजस्थानी में नई लेखिकाएं जुड़ेंगी, साहित्य समृद्ध होगा और उन विधाओं में सृजन का मार्ग प्रशस्त होगा, जिनमें कार्य बेहद कम हुआ है।