गुप्त नवरात्र में इन 10 महाविद्याओं करते हैं पूजा, जानें किस तरह हुई उत्पत्ति

गुप्त नवरात्र शुरू हो चुके हैं और इन नवरात्र में देवी दुर्गा की 10 महाविघाओं की साधना की जाती है। यह नवरात्र 12 फरवरी से शुरू हो रहे हैं और 21 फरवरी को समाप्त हो रहे हैं। सालभर में चार नवरात्र आते हैं। इनमें दो प्रत्यक्ष रूप से आते हैं, जिनमें गृहस्थ जीवन वाले पूजा-पाठ करते हैं और दो गुप्त रूप से आते हैं, जिनमें साधु, सन्यासी, सिद्धि प्राप्त करने वाले, तांत्रिक आदि साधना करते हैं। गुप्त नवरात्र में तंत्र साधना का विशेष महत्व है और देवी की दस महाविघाएं की पूजा तंत्र शक्ति और सिद्धियों के लिए की जाती है। दस महाविघा आदि शक्ति की अवतार मानी जाती हैं और विभिन्न दिशाओं की अधिष्ठात्री शक्तियां हैं। तंत्र साधना करने वाले इन महादेवियों की पूजा गुप्त रूप से करते हैं इसलिए इनको गुप्त नवरात्र कहा जाता है।

यह है दस महाविद्या
दस महाविद्याओं में दो कुल माने जाते हैं, जो काली कुल तथा श्रीकुल हैं।
काली कुल – मां काली, मां तारा और मां भुवनेश्वरी
श्रीकुल – मां बगलामुखी, मां कमला, मां छिन्नमस्ता, मां त्रिपुर सुंदरी, मां भैरवी, मां मांतगी और मां धूमावती

 

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शिव और विष्णु को इनसे ही मिलती हैं शक्तियां
भक्त अपनी रुचि और भक्ति के अनुसार किसी एक कुल की साधना कर सिद्धियों को प्राप्त करते हैं। पूरे ब्रह्मांड की शक्तियों का स्त्रोत यही दस महाविद्या हैं। इनको शक्ति भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवों के देव महादेव भी शक्ति के बिना शव के समान हो जाते हैं। यहां तक बिष्णुजी को भी इन्हीं से शक्तियों मिलती हैं और इनका संबंध श्रीहरि के दस अवतारों से भी है। जैसे भगवान राम को तारा और भगवान कृष्ण को काली का अवतार माना गया है।

महाविद्या से ही भगवान विष्णु के भी दस अवतार माने गए हैं
महाविद्या – विष्णु के अवतार
1- काली – कृष्ण
2- तारा – मत्स्य
3- षोडषी – परशुराम
4- भुवनेश्वरी – वामन
5- त्रिपुर भैरवी – बलराम
6– छिन्नमस्ता – नृसिंह
7- धूमावती – वाराह
8- बगला – कूर्म
9– मातंगी – राम
10- कमला – भगवान बुद्ध विष्णुजी का कल्कि अवतार दुर्गाजी का माना गया है।

 

इस तरह 10 महाविद्याओं की उत्पत्ति
देवीभागवत पुराण के अनुसार, महाविद्याओं की उत्पत्ति भगवान शिव और उनकी पत्नी सती के बीच विवाद के कारण हुई थीं। एकबार दक्ष प्रजापति ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया था, उसमें महादेव और सति को छोड़कर सभी देवी-देवताओं का आमंत्रित किया था। सति महादेव से पिता के यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं। महादेव ने उनकी बातों को अनसुना कर दिया। इस पर सती ने स्वयं को एक भयानक रूप में परिवर्तित (महाकाली का अवतार) कर लिया, जिसे देखकर भगवान शिव भागने लगे। अपने पति को डरा हुआ देखकर माता सती उन्हें रोकने लगीं। भगवान शिव जिस दिशा में भागने लगे, उस दिशा में मां का एक अन्य विग्रह प्रकट होकर उनको रोकता। इस प्रकार दसों दिशाओं में मां ने दस रूप ले लिए, वे दस रूप ही दस महाविद्याएं कहलाईं। इससे भगवान शिव ने माता सती को जाने की अनुमति दे दी। वहां पहुंचने के बाद माता सती और दक्ष प्रजापति के पिता के बीच विवाद हुआ। दक्ष प्रजापति ने शिव की निंदा की और फिर यज्ञ कुंड में प्राणों की आहुति दे दी।

 

दस महाविद्या विभिन्न दिशाओं की अधिष्ठातृ शक्तियां हैं।
देवी के अवतार – दिशा
1- भगवती काली – उत्तर दिशा
2- तारा देवी – उत्तर दिशा
3- श्री विद्या (षोडशी-त्रिपुर सुंदरी) – ईशान दिशा
4- देवी भुवनेश्वरी – पश्चिम दिशा
5- श्री त्रिपुर भैरवी – दक्षिण दिशा
6- माता छिन्नमस्ता – पूर्व दिशा
7- भगवती धूमावती – पूर्व दिशा
8- माता बगला (बगलामुखी) – दक्षिण दिशा
9- भगवती मातंगी – वायव्य दिशा
10- माता श्री कमला – नैऋत्य दिशा