आदिवासी महिलाएं बना रहीं हैं ऑर्गेनिक हर्बल गुलाल, ऑस्ट्रेलिया तक है मांग

जिले के आदिवासी बाहुल्य इलाके कोटड़ा में राजीविका स्वंय सहायता समूह की 300 से अधिक महिलाएं ऑर्गेनिक हर्बल गुलाल(Organic Herbal Gulal) बनाकर रोजगार के अवसर बढ़ाकर आत्म निर्भर बन रही है. मजदूरी और खेतो में काम करने वाली महिलाएं अब पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर कोटड़ा की काया पलटने में आगे आ रही हैं. दरसअल कोटड़ा का शुद्ध देशी हर्बल गुलाल स्थानीय वनस्पतियों एवं फूलों से बनाया जाता है. देवला रेंज वन विभाग द्वारा निर्मित हर्बल गुलाल ऑस्ट्रेलिया तक अपनी पहले ही पहचान बना चुका है.

ऐसे बनता है हर्बल गुलाल

हर्बल गुलाल बनाने के लिए फूल एवं पत्तियों का उपयोग किया जाता हैं. हरे रंग के लिए रिजका, लाल रंग के लिए चुकंदर, गुलाबी के लिए गुलाब के फूल,पीलें रंग के लिए पलाश के फूलों का मिश्रण तैयार कर गर्म पानी मे उबाला जाता है और बाद में ठंडा करके आरारोट के आटे को मिलाकर मिक्सर में पीसकर सुगंधित अर्क डालकर हर्बल गुलाल तैयार किया जाता है. कोटडा के गोगरुद में राजीविका स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा तैयार गुलाल दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात एवं राजस्थान के अधिकांश बड़े शहरो तक पहुँचाया जा रहा है.सोशल मीडिया से हो रहा है प्रचार 

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देशी हर्बल गुलाल की बिक्री एवं मार्केटिंग के लिए कोटड़ा विकास अधिकारी धनपत सिंह राव भी अनोखे अंदाज में प्रचार के लिए विख्यात हैं इन दिनों विकास अधिकारी अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपनी फेसबुक आईडी और व्हाट्सएप्प ग्रुप के माध्यम से हर्बल गुलाल का प्रचार कर रहे है. कोटड़ा में हर्बल गुलाल के लिए दो राजीविका केंद्र बनाये गए है. जिसमे गोगरुद और जुड़ा वंदन केंद्र शामिल है. 300 से ज्यादा महिलाओं के समूह ने अब तक होली के त्योहार को देखते हुए 3 क्विंटल हर्बल गुलाल बेच चुकीं हैं. गोगरुद केंद्र पर 10 क्विंटल और जुड़ा वंदन केंद्र पर 15 क्विंटल गुलाल बनाने का अतिरिक्त आर्डर दिया गया है. यह गुलाल दो ब्रांड में उपलब्ध है. विकास अधिकारी धनपत सिंह राव ने बताया कि कोटड़ा क्षेत्र में उत्पादित होने वाली वनोपज काफी बहुतायत में मिलती है अगर यहाँ अच्छा निवेश किया जाए तो स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सकता है, जिसमे प्रमुख रूप से सीताफल पल्प, जामुन अर्क ,बाँस के फर्नीचर, धव का गोंद, देशी शहद एवं पत्तल दोने शामिल हैं.